
एक चेहरा...हजारों शिकन
हर शिकन...हजार किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से
रस्ते में ही खो जाती हैं
सपनों की सब बातें
अब भीगें हम किस सावन में
कौन करे बरसातें
दिन भी देखो खूब जलाए
डंसती काली रातें
दिन की भी है अपनी कहानी
रात के अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से
किसी ने खोया अपना बचपन
खोए कोई जवानी
कौन सुनेगा किसकी खोई
सबकी अपनी कहानी
कोई सब कुछ ले लेता है
कोई सब कुछ दे देता है
कोई भूले अपनी कहानी
और सुनाए किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से
हंसता देखो दिन में कोई
रैन भिगोए अखियां
सबके अपने बिछड़े साथी
सबकी अपनी सखियां
सबका अपना टूटा दिल है
सबकी अपनी मुश्किल
रस्ते में ही खोई
तुमने-हमने
अपनी मंजिल
हर चेहरे के अपने गम हैं
अपने-अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से।
(.... ek bahut pahle likha geet)
लेबल: कवितायेँ
(गुजरात दंगों के बाद कुछ टूट गया था दिल में, जिसकी फांस शायद ही कभी निकल पाए, ये कविता है तो उसी परिप्रेक्ष्य में लेकिन बापू के जन्मदिन के साथ अयोध्या के अन्याय ने सारे जख़्म जैसे फ़िर से हरे कर दिये…… और इन सब के बीच आज की शान्ति…………)
बापू से संवाद -2
बापू
हमें फिर से बताओ
शान्ति क्या होती है?
वो जो दिखती है चेहरे पर
या वो
जो कत्ल के बाद
लाश पे रोती है
ये शान्ति है/
या बन्दरों के आखों की चमक
जिनके हाथों में सत्ता का अस्तूरा है
उन्हें नहीं सुनाई देतीं
कराहती आहें
;वो ‘बुरा नहीं सुनते’
पर ‘बुरा’ भी नहीं सुनतेद्ध
ये कैसी शान्ति
के सब शान्त
कातिल भी मकतूल भी
बुरा है
कत्ल करते देख लेना
विरोध का स्वर उससे भी बुरा
तो बापू!
हमें फिर से बताओ
शान्ति क्या होती है
वो जो दिखती है चेहरे पर
या वो जो हर उत्सव के बाद/
राजघाट धोती है
बापू!
शान्ति आज
खद्दर लपटे
रैम्प की कैट वाक पर है
और बाजार में हैं
दोनो के खरीदार
लहू की प्यास से तरबतर
घात लगाता शिकारी
शान्त था हमेंशा
पर मकतूल ने जब भी चाहा चीखना
तुम्हारी किताबें थमा दीं
बन्दरों ने
उनके थप्पड़ की छाप
दिखती है तुम्हारे चेहरे पर
और दहल गए हैं हम भी
इसलिए
बापू!
हमें फिर से बताओ
शान्ति क्या होती है
वो जो दिखती है चेहरे पर
या वो चुप
जो नया कत्ल बोती है।
लेबल: कवितायेँ

(गुजरात दंगों के बाद कुछ टूट गया था दिल में, जिसकी फांस शायद ही कभी निकल पाए, ये कविता है तो उसी परिप्रेक्ष्य में लेकिन बापू के जन्मदिन के साथ अयोध्या के अन्याय ने सारे जख़्म जैसे फ़िर से हरे कर दिये - पवन मेराज )
बापू से संवाद -1

बापू!
तुमने क्या सोचा था
तुम्हें हिंसा की सूली/
चढ़ाने के बाद
वो खूनी हाथ रूक जाएंगे!
क्या रक्त
बस इसलिए धो ड़ालता
बारूदी गन्ध!
के मृत्यु के अन्तिम/
क्षणों में भी
तुम्हारे मुख से निकला था
हे!राम!
बापू!
वो हाथ रूका नहीं
वो हाथ
आज संस्कृति के बीज बोता है
यूं तो बीज पहले के भी थे
जो पेड़ बने
पर आज जब लहलहाई है वो फसल
तो गायब है
राम के चेहरे से सारा विनय
खिच चुकी है प्रत्यन्चा
और सजा तीर
कौन दिशा में है
किसके लिए है
ये तो राम ही जाने
मैं तो जानता हूं बस इतना
किसी सीने में धंसी
तलवार पर थे
कुछ शब्द
पढ़ा तो कांप उठा दिल-
‘जय श्री राम’
बापू!
यह
‘हे राम’ से ‘श्री राम’ हो जाने की कथा है
या व्यथा है -
तुम्हारे बनबासी राम की
जो आदी हो चुके हैं
जंगलों के
तभी तो
राम भक्त हाथों ने
शहर में जंगल उगाए हैं
राम का घर बनाने को
बहुत से घर जलाए हैं।
लेबल: कवितायेँ
जल सकते हैं
या जला सकते हैं
आग का काम है जलना
जलती रहेगी
आग निगल सकती है
हवेलियाँ
किन्तु नहीं पलती पत्थरों पर
आग पलने लायक
गेहूं कि बाल सा तपा
फूस सा नर्म दिल
सिर्फ हमारे पास है
जानता हूँ
ये सुलगता
ह्रदय को तपता
क्रोध से बड़ा कुछ है
किन्तु क्या होगा
कविता में गर ख़ोज भी लें
दिल में धधकती के लिए
आग से बड़ा कोई शब्द....
शब्द तो बाँझ है
अपने अर्थों के बिना
और आग के मायने हैं लज्ज़त
घर में चूल्हों तरह
आग के मायने हैं फ़ैल जाना
विचारों कि तरह
तिनका दर तिनका
और सबसे बढ़ कर
आग तो प्यार है मेरे दोस्त
जो तेरे सुलगते सीने को
मेरे सुलगते सीने से जोडती है
तो अपना सुलगता दिल लिए
खामोश क्यों बैठे हो
देख लो
बस तय करना है
जल सकते हैं
या जला सकते हैं
वर्ना आग का काम है जलना जलती रहेगी.
लेबल: कवितायेँ
''तूफ़ान आया
झुक कर बची रह गई घास
और सारे तने पेड़
हो गए थे जमीदोज़''
यही कथा सुनी न जाने कितनी बार
बाप से तकरार करती मेरी आँखों को पढ़
माँ यूं सुनाती ये किस्सा
जैसे सुना रही हो अपना पूरा जीवन
जैसे थाम लेना चाहती हो वक्त
रोक देना चाहती हो
एक तूफ़ान।
उस आवाज के सन्नाटे में
अकेला सा हो जाता मै
सोचता
गर यही जीत है
तो हार किसे कहते हैं।
बाप, गुरुओं से होते हुए
अब हाकिमों से सुनता हूँ
यही कथा
जैसे हो मौसम विभाग की कोई चेतावनी
'' सब्ज मौसम बदल सकता है
आ सकता है कोई तूफ़ान कभी भी''
:
:
नहीं कोई तूफ़ान नहीं आया
हमने आने ही नहीं दिया
पर सन्नाटे में
अपना-अपना अकेलापन लिए
अपने- अपने से अजनबी
हम सभी
हमदर्द दोस्त
जिन्होंने संजो रखे हैं अब भी
न जाने किन किस्सों के जमीदोज़ पेड़
हो जाते हैं
कुछ और अकेले
जब छेड़ देता है कोई ये बदमजा किस्सा
'' छाया सिर्फ वही पेड़ देते हैं
जो तने रहते हैं ''
लेबल: कवितायेँ
बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी !
(ज्ञात होगा कुशीनगर बुद्ध की निर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है। पिछडे़पन का दंश झेल रहे भारत के तमाम गावों की तरह ही यह स्थान भी अब विकास के कहर से रूबरू है....पर्यटन विकास के नाम पर यहां बुद्ध की 500 फिट उंची प्रतिमा बनाई जाएगी और इस परियोजना के प्रथम चरण में ही 7 गांव किसी ठोस योजना के अभाव में न जाने कहां को विस्थापित कर दिए जाएंगे। इस परियोजना का लगातार 6 साल से विरोध करते आ रहे किसानों की उन बौद्ध मठों ने भी नहीं सुनी जो शायद इसमें बैद्ध घर्म (मठ और मठाधींशों ) के विस्तार को तलाश रहे हैं। हालांकि यह कविता सिर्फ इसी बारे में नहीं, पर है उन्हीं संघर्षरत किसानों को समर्पित। -पवन मेराज )
(1)
यहां सोया है एक शख़्स
जो जाग गया था एक दिन/
दर्द की दस्तक से कुछ ऐसा धड़का दिल
छोड़ दिया राज-पाट लौट आया गांव
(हालांकि नहीं आती थी कोई भी सड़क
राजप्रासाद से गावांे की तरफ पर वह लौट आया...)
उसे तलाश थी दुख की
जीतना था उसे सबके लिए।
हमारे जेहन का
कुछ तो हिस्सा है उसका भी
और हैं अपने हिस्से के सवाल भी
उसके जेहन के लिए
छोड़ क्यूं आए थे/ राहुल को सोता ही?
यशोधरा को साथ क्यूं न लिया?
और कोई इच्छा ही न रहे
ये भी अजब दुर्निवार इच्छा है!
लाख अपना हो/ अक्स उसका
पर ये कहानी उसकी नहीं
ये कहानी है उस गांव की
जो अन्न बोता रहा ..... भूख फांकता रहा
कहानी है तमाम गावों की
जो सिद्धार्थ को तराश बुद्ध गढ़ते है।
खुद कुछ नहीं बनते ये गांव
नहीं जाती है कोई भी सड़क
गावांे से राजधानी की तरफ.....
पर वह लौट आया था यहां बेचैन!
अकेला! दुखांे के अन्त के लिए/
दुख तलाशने को अभिशप्त!
उसका धरम नहीं था इतिहास के ताड़पत्रों पर
‘दुख है .... तो कारण भी होगा’
तर्क की राह वो चला तो था कुछ दूर
पर उसने नहीं बनाई कोई भी सड़क
जो जाती हो गावों से राजधानी की तरफ
और
राजप्रासाद ने मुस्कुराकर छान लिया उसका धर्म
और एक तर्क गढ़ा
धर्म तर्कों से परे है।
ताड़पत्रों पर लिखे किस्सो ने/
उसे बना दिया ईश्वर
और गांव रह गया अकेला.....
ये गांव तब भी अकेले थे
जब तोड़े गए थे बामियान के तराशे पहाड़
और तब भी जब गढ़ा गया था इन्हें।
(2)
गांव रह गए तब और अकेले
जब बन रही थीं सड़कें
जुड़ रहे थे शहर....
कितने सिद्धार्थ सोते बच्चों को बिना प्यार किए
चले आए थे इधर बेचैन! अकेले!
दुखांे के अन्त के लिए/
दुख पाने को अभिशप्त!....
...गोड़वाऽ में जूता नईखेऽ
सरवा पे छतवाऽ हेऽऽ सजनी.....
पर बहुत व्यस्त होते हैं शहर
ये सिद्धार्थ को तराश बुद्ध नहीं गढ़ा करते
यहां हसरत भरी निगाह
चोरी की साजिश फुटपाथ पर बिछाया बोरा
और साम्राज्य के एक हिस्से पर कब्जा
अक्सर रख लिया जाता है/
सब कुछ एक ही खाने में।
पर दुत्कारते शहर को भी जरूरत थी
उसकी सो भगाया नहीं गया/
कभी पूरा का पूरा
हां रक्खा भी नहीं कभी अपने पास
दूर बजती थी एक धुन उदास
‘लागाऽ झुलनी का धक्का बलम कलकत्ताऽ .... पहुंच गइलें नाऽ’
इन्तज़ार सिर्फ एक ख़ला नहीं
झुलनी के लिए तन-चुल्हा और मन
हो गया धीरे-धीरे पहाड़
पर लौट कर नहीं आया उसका बुधिया
कभी पूरा का पूरा.....
सो नहीं दर्ज हुआ विस्थापन के बही ख़ातों में
कुछ भी ना मिला कोई हर्जाना
सियाही से आती रही
लहू की गन्ध पर ताड़पत्रों में
कहीं नहीं था उनका नाम
दर्ज है जिनका नाम
वो भी अब आने लगे हैं
गांव सदी का महान छाया-नायक कहता है-
‘किसान हूं मैं!’
और गांव हो जाता है कुछ और अकेला
सिंगूर, नन्दीग्राम खून के छींटे
हर तरफ ताड़पत्रों की प्यास बुझी नहीं अब तलक.....
(3)
अब आने वालों के पास है
सागर भर लेने की प्यास
और देने के लिए रिसती बूंद का स्वप्न
सदियों से ऐसी ही किसी बूंद को तरसता यह गांव
जहां सोया है एक शख़्स
जो जाग गया था एक दिन दर्द की दस्तक से
बह जाएगा इसका इतिहास भी.......
कौन सोचता है बुधिया और झुलनी
कहां होंगें तब जिनके लिए नहीं बचा
गांवों में भी कोई अकेला कोना
जगमगाते होटलों के बीच
तब खड़ा होगा एक राजप्रासाद,
राजप्रासद का स्वप्न/
देखने वालों के लिए और
हाय! चेहरे पर शान्त-स्निग्ध सी/
मुस्कुराहट लिए बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी।
लेबल: कवितायेँ
(बहुत से लोगों ने कहा की बहुत दिन हुए कुछ लिखा ही नहीं .... माफ़ी चाहता हूँ आप लोगों से, पर इत्मिनान रखिये लिखने के लिए ही आज कल जिंदगी को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ )
फिर भी दोस्तों के इसरार पर .....
ज़िन्दगी एक ख़ूबसूरत क़िताब है
इसे हड़बड़ी में न पढ़ें .....
कभी एक पन्ना मोड़ कर
पिछले सारे किस्से से कर लें बात
क्या पता
कहीं कोई एहसास छूट गया हो
अनदेखा।
अनचीन्हा /
कोई सपना
टूट गया हो
और पता भी न चला हो
ऐसा कोई सपना था भी कभी ।
जनाब !
यूँ कब तक बस जिल्द संवारते रहेंगे
जरा ध्यान तो दें
कभी
लिखे पर भी
वाह !
सारी दुनिया से छुपा कर
बड़ा महफूज रखा है आपने इसे
कभी किसी को तो पढ़ने दें !
हाँ जनाब !
जानता हूँ किताबों के साथ
होते हैं खतरे बड़े
पर सबसे बड़ा ख़तरा तो यही है
के इसे कोई न पढ़े
इसी लिए तो कहता हूँ
जिन्दगी एक
खूबसूरत क़िताब है
इसे हड़बड़ी में न पढ़ें ......
- पवन मेराज
लेबल: कवितायेँ