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ये धुआं जहाँ से उठता है....

जल सकते हैं
या जला सकते हैं
आग का काम है जलना
जलती रहेगी

आग निगल सकती है
हवेलियाँ
किन्तु नहीं पलती पत्थरों पर
आग पलने लायक
गेहूं कि बाल सा तपा
फूस सा नर्म दिल
सिर्फ हमारे पास है

जानता हूँ
ये सुलगता
ह्रदय को तपता
क्रोध से बड़ा कुछ है
किन्तु क्या होगा
कविता में गर ख़ोज भी लें
दिल में धधकती के लिए
आग से बड़ा कोई शब्द....
शब्द तो बाँझ है
अपने अर्थों के बिना
और आग के मायने हैं लज्ज़त
घर में चूल्हों तरह
आग के मायने हैं फ़ैल जाना
विचारों कि तरह
तिनका दर तिनका
और सबसे बढ़ कर
आग तो प्यार है मेरे दोस्त
जो तेरे सुलगते सीने को
मेरे सुलगते सीने से जोडती है
तो अपना सुलगता दिल लिए
खामोश क्यों बैठे हो
देख लो
बस तय करना है
जल सकते हैं
या जला सकते हैं
वर्ना आग का काम है जलना जलती रहेगी.

3 टिप्पणियाँ:

खामोश क्यों बैठे हो
देख लो
बस तय करना है
जल सकते हैं
या जला सकते हैं
वर्ना आग का काम है जलना जलती रहेगी.
......गहरी भावाभिव्यक्ति ..
बहुत अच्छा लिखते है आप! खूब लिखते रहिये ....
बहुत सुखद अहसास हुआ आपके ब्लॉग पर आकर.0...
मुझे इस तरह की रचनाएँ बहुत अच्छी लगती हैं जो सरल किन्तु सामजिक जीवन से और जन सामान्य से जुडी होती हैं...
बहुत हार्दिक शुभकामनाएं

6 सितंबर 2010 को 2:31 am  

कविता रावत जी तारीफ के लिए शुक्रिया :-)... कोशिश करूँगा तमाम आपाधापी के बावजूद लिखते रहने की जिद को बनाये रख सकू

12 सितंबर 2010 को 1:36 am  

तुम्हारे सीने में जलती रही यह आग़्…

23 सितंबर 2010 को 11:32 am  

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