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बापू से संवाद -1



(गुजरात दंगों के बाद कुछ टूट गया था दिल में, जिसकी फांस शायद ही कभी निकल पाए, ये कविता है तो उसी परिप्रेक्ष्य में लेकिन बापू के जन्मदिन के साथ अयोध्या के अन्याय ने सारे जख़्म जैसे फ़िर से हरे कर दिये - पवन मेराज )

बापू से संवाद -1


बापू!
तुमने क्या सोचा था
तुम्हें हिंसा की सूली/
चढ़ाने के बाद
वो खूनी हाथ रूक जाएंगे!
क्या रक्त
बस इसलिए धो ड़ालता
बारूदी गन्ध!
के मृत्यु के अन्तिम/
क्षणों में भी
तुम्हारे मुख से निकला था
हे!राम!

बापू!
वो हाथ रूका नहीं
वो हाथ
आज संस्कृति के बीज बोता है
यूं तो बीज पहले के भी थे
जो पेड़ बने
पर आज जब लहलहाई है वो फसल
तो गायब है
राम के चेहरे से सारा विनय
खिच चुकी है प्रत्यन्चा
और सजा तीर
कौन दिशा में है
किसके लिए है
ये तो राम ही जाने
मैं तो जानता हूं बस इतना
किसी सीने में धंसी
तलवार पर थे
कुछ शब्द
पढ़ा तो कांप उठा दिल-
‘जय श्री राम’

बापू!
यह
‘हे राम’ से ‘श्री राम’ हो जाने की कथा है
या व्यथा है -
तुम्हारे बनबासी राम की
जो आदी हो चुके हैं
जंगलों के
तभी तो
राम भक्त हाथों ने
शहर में जंगल उगाए हैं
राम का घर बनाने को
बहुत से घर जलाए हैं।

2 टिप्पणियाँ:

" sunder rachana .bhav aur samaj se bhari rachana ke liye tahe dilse sukriya "

plz read more about gandhi ji

गाँधीजी - आओ जाने गाँधीजी की बंद किताब की बातें { जो दुर्लभ है } http://eksacchai.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#links

---- eksacchai {AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

2 अक्तूबर 2010 को 1:18 pm  

Shuriya tulsi bhai ... mai ye likn dekhta hun

4 अक्तूबर 2010 को 12:05 am  

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