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उलझन



एक चेहरा...हजारों शिकन
हर शिकन...हजार किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

रस्ते में ही खो जाती हैं
सपनों की सब बातें
अब भीगें हम किस सावन में
कौन करे बरसातें
दिन भी देखो खूब जलाए
डंसती काली रातें
दिन की भी है अपनी कहानी
रात के अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

किसी ने खोया अपना बचपन
खोए कोई जवानी
कौन सुनेगा किसकी खोई
सबकी अपनी कहानी
कोई सब कुछ ले लेता है
कोई सब कुछ दे देता है
कोई भूले अपनी कहानी
और सुनाए किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

हंसता देखो दिन में कोई
रैन भिगोए अखियां
सबके अपने बिछड़े साथी
सबकी अपनी सखियां
सबका अपना टूटा दिल है
सबकी अपनी मुश्किल
रस्ते में ही खोई
तुमने-हमने
अपनी मंजिल
हर चेहरे के अपने गम हैं
अपने-अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से।

(.... ek bahut pahle likha geet)

3 टिप्पणियाँ:

हर चेहरे के अपने गम हैं
अपने-अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से।

बहुत बढ़िया लिखा है..बहुत पहले का ही सही...

6 दिसंबर 2010 को 2:16 am  

एक चेहरा...हजारों शिकन
हर शिकन...हजार किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

रस्ते में ही खो जाती हैं
सपनों की सब बातें
अब भीगें हम किस सावन में
कौन करे बरसातें
दिन भी देखो खूब जलाए
डंसती काली रातें
दिन की भी है अपनी कहानी
रात के अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

किसी ने खोया अपना बचपन
खोए कोई जवानी
कौन सुनेगा किसकी खोई
सबकी अपनी कहानी
कोई सब कुछ ले लेता है
कोई सब कुछ दे देता है
कोई भूले अपनी कहानी
और सुनाए किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

अति सुन्दर...भावपूर्ण...

6 दिसंबर 2010 को 7:02 am  

... bahut sundar !!!

9 दिसंबर 2010 को 12:36 am  

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