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(कहते हैं 16 साल की उम्र में दिल..... खैर छोड़िये बिना किसी भूमिका के एक कविता आपके सामने पेश है ... ये कविता मैंने उसी 16 साल की उम्र में लिखी थी.)

प्रेमिका के नाम एक ख़त.....

दोस्त!
तुम पूछती हो न
मेरा दिल क्यों शाद नहीं है
उलझ के जिंदगी की रंगीनियों में मैं
क्योँ सुलझा नहीं लेता ग़मों की सारी गुत्थियाँ
देख के तुम सी हसीं
क्योँ उदास हो जाता हूँ
कहाँ खो जाता हूँ.

सोचता हूँ मैं
जब उम्र ने उसके चेहरे पर
अपना हिसाब नहीं लिखा होगा,
जब अनुभव सिलवटें नहीं बने होंगे
न सिलवटें चेहरा
तब उसकी जुल्फों का रंग रहा होगा गहरा
तब माँ भी खूबसूरत रही होगी
बिलकुल तुम सी
हँसती हुई
खिलखिलाती हुई.

यूँ तो माँ अब भी खूबसूरत है
बहुत कुछ भूल के
जब वो कुछ याद करती है
यादों की लहर
जब बहा ले जाती है माथे की शिकन
और हंस देती है हौले से जब कभी
तब माँ भी.....

दोस्त!
सब जानते हैं - पर मानते नहीं
उसकी हंसी को उम्र ने नहीं पिया
मै भी जानता हूँ
उसकी हंसी सुखा ले जाने वालों के नाम
पर बता नहीं सकता
जैसे गणित नहीं निकाल पता
सिलवटों में छिपे सवालों का हल
चार दीवारें + एक छत
=
जेलघर या घरमहल...

माँ को भी कहाँ था मालूम
जब संस्कारों की चौकी पर बैठ
देख कर अतीत का दर्पण
उसने लज्जा का श्रृंगार किया
हाय! नहीं था मालूम
उसने छोड़ दिया हक़ लड़ने का
बांध दी बेड़ियाँ अपनी ही दर्द की चीख़ पर
फिर संघर्ष बस इतना ही
एक अँधेरी गुफा से निकल
दूसरी अँधेरी गुफा में जाना
घुलते जाना - घुलते जाना
फिर क्या जेल - क्या घर
क्या परिवार - क्या चक्की
समाज कुछ और नहीं
बस तनी उंगलियाँ
जिनका काम ही है
वक्त -बेवक्त उठ जाना किसी भी तरफ

माँ को नहीं था मालूम
पर तुम समझ लेना मेरी दोस्त!
उम्र जिंदगी नहीं होती
न प्यार समझौता
इनके लिए लड़ती रहना मेरी दोस्त
इस पूरी दुनिया से
और दूसरे पाले में
मुझसे और खुद से भी.

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