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बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी !
(ज्ञात होगा कुशीनगर बुद्ध की निर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है। पिछडे़पन का दंश झेल रहे भारत के तमाम गावों की तरह ही यह स्थान भी अब विकास के कहर से रूबरू है....पर्यटन विकास के नाम पर यहां बुद्ध की 500 फिट उंची प्रतिमा बनाई जाएगी और इस परियोजना के प्रथम चरण में ही 7 गांव किसी ठोस योजना के अभाव में न जाने कहां को विस्थापित कर दिए जाएंगे। इस परियोजना का लगातार 6 साल से विरोध करते आ रहे किसानों की उन बौद्ध मठों ने भी नहीं सुनी जो शायद इसमें बैद्ध घर्म (मठ और मठाधींशों ) के विस्तार को तलाश रहे हैं। हालांकि यह कविता सिर्फ इसी बारे में नहीं, पर है उन्हीं संघर्षरत किसानों को समर्पित। -पवन मेराज )
(1)
यहां सोया है एक शख़्स
जो जाग गया था एक दिन/
दर्द की दस्तक से कुछ ऐसा धड़का दिल
छोड़ दिया राज-पाट लौट आया गांव
(हालांकि नहीं आती थी कोई भी सड़क
राजप्रासाद से गावांे की तरफ पर वह लौट आया...)
उसे तलाश थी दुख की
जीतना था उसे सबके लिए।
हमारे जेहन का
कुछ तो हिस्सा है उसका भी
और हैं अपने हिस्से के सवाल भी
उसके जेहन के लिए
छोड़ क्यूं आए थे/ राहुल को सोता ही?
यशोधरा को साथ क्यूं न लिया?
और कोई इच्छा ही न रहे
ये भी अजब दुर्निवार इच्छा है!
लाख अपना हो/ अक्स उसका
पर ये कहानी उसकी नहीं
ये कहानी है उस गांव की
जो अन्न बोता रहा ..... भूख फांकता रहा
कहानी है तमाम गावों की
जो सिद्धार्थ को तराश बुद्ध गढ़ते है।
खुद कुछ नहीं बनते ये गांव
नहीं जाती है कोई भी सड़क
गावांे से राजधानी की तरफ.....
पर वह लौट आया था यहां बेचैन!
अकेला! दुखांे के अन्त के लिए/
दुख तलाशने को अभिशप्त!
उसका धरम नहीं था इतिहास के ताड़पत्रों पर
‘दुख है .... तो कारण भी होगा’
तर्क की राह वो चला तो था कुछ दूर
पर उसने नहीं बनाई कोई भी सड़क
जो जाती हो गावों से राजधानी की तरफ
और
राजप्रासाद ने मुस्कुराकर छान लिया उसका धर्म
और एक तर्क गढ़ा
धर्म तर्कों से परे है।
ताड़पत्रों पर लिखे किस्सो ने/
उसे बना दिया ईश्वर
और गांव रह गया अकेला.....
ये गांव तब भी अकेले थे
जब तोड़े गए थे बामियान के तराशे पहाड़
और तब भी जब गढ़ा गया था इन्हें।
(2)
गांव रह गए तब और अकेले
जब बन रही थीं सड़कें
जुड़ रहे थे शहर....
कितने सिद्धार्थ सोते बच्चों को बिना प्यार किए
चले आए थे इधर बेचैन! अकेले!
दुखांे के अन्त के लिए/
दुख पाने को अभिशप्त!....
...गोड़वाऽ में जूता नईखेऽ
सरवा पे छतवाऽ हेऽऽ सजनी.....
पर बहुत व्यस्त होते हैं शहर
ये सिद्धार्थ को तराश बुद्ध नहीं गढ़ा करते
यहां हसरत भरी निगाह
चोरी की साजिश फुटपाथ पर बिछाया बोरा
और साम्राज्य के एक हिस्से पर कब्जा
अक्सर रख लिया जाता है/
सब कुछ एक ही खाने में।
पर दुत्कारते शहर को भी जरूरत थी
उसकी सो भगाया नहीं गया/
कभी पूरा का पूरा
हां रक्खा भी नहीं कभी अपने पास
दूर बजती थी एक धुन उदास
‘लागाऽ झुलनी का धक्का बलम कलकत्ताऽ .... पहुंच गइलें नाऽ’
इन्तज़ार सिर्फ एक ख़ला नहीं
झुलनी के लिए तन-चुल्हा और मन
हो गया धीरे-धीरे पहाड़
पर लौट कर नहीं आया उसका बुधिया
कभी पूरा का पूरा.....
सो नहीं दर्ज हुआ विस्थापन के बही ख़ातों में
कुछ भी ना मिला कोई हर्जाना
सियाही से आती रही
लहू की गन्ध पर ताड़पत्रों में
कहीं नहीं था उनका नाम
दर्ज है जिनका नाम
वो भी अब आने लगे हैं
गांव सदी का महान छाया-नायक कहता है-
‘किसान हूं मैं!’
और गांव हो जाता है कुछ और अकेला
सिंगूर, नन्दीग्राम खून के छींटे
हर तरफ ताड़पत्रों की प्यास बुझी नहीं अब तलक.....


(3)
अब आने वालों के पास है
सागर भर लेने की प्यास
और देने के लिए रिसती बूंद का स्वप्न
सदियों से ऐसी ही किसी बूंद को तरसता यह गांव
जहां सोया है एक शख़्स
जो जाग गया था एक दिन दर्द की दस्तक से
बह जाएगा इसका इतिहास भी.......
कौन सोचता है बुधिया और झुलनी
कहां होंगें तब जिनके लिए नहीं बचा
गांवों में भी कोई अकेला कोना
जगमगाते होटलों के बीच
तब खड़ा होगा एक राजप्रासाद,
राजप्रासद का स्वप्न/
देखने वालों के लिए और
हाय! चेहरे पर शान्त-स्निग्ध सी/
मुस्कुराहट लिए बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी।

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