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(अपनी ही डायरी के कुछ पिछले पन्नों से बतियाते हुए हाशिए पर लिखीं अपनी कुछ कविताओं से मुलाकात हो गई.... डर लगा वक्त की धूल के गुबार में कहीं खो ना जाएं. सोचा आपसे परिचय करवा दूं तो यूं अकेली नहीं रहेंगी)


‘बच्चा देख रहा है सपने.......’
बच्चा देख रहा है सपनें....
बाकी ही है अभी
उसके सपनों का एक-एक करके टूट जाना
और बच्चा नहीं जानता
सपनों की इस लगातार टूटन से उकताकर
एक नींद
डतर आएगी उसके भीतर
फिर वो कई सीढ़ियां चढ़ेगा
लेकिन आगे नहीं बढ़ेगा
हां ! बड़ा होना बड़ी निर्मम प्रक्रिया है
काश!
बच्चा सीख ले वक्त रहते ख़्वाब संजोना
जागते रहने को
बहुत जरूरी है /
किसी ख़्वाब का होना।

दोस्तों से .....
हैरान मत होना
गर कहूं
सिर्फ आड़ी तिरछी रेखांए
मुड़कर-जुड़कर
बन जानी हैं अक्षर
अक्षर ......शब्द
और शब्द कविता

आओ!
हम जुड़ें ऐसे
नई दुनियां बना दें।


एक अश्लील चुटकुला......
उजाड़ एक पुरानी बस्ती
बना दिया गया
एक खूबसूरत पार्क
और बोर्ड पर मैने
फूल तोड़ना मना है।

उलझन



एक चेहरा...हजारों शिकन
हर शिकन...हजार किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

रस्ते में ही खो जाती हैं
सपनों की सब बातें
अब भीगें हम किस सावन में
कौन करे बरसातें
दिन भी देखो खूब जलाए
डंसती काली रातें
दिन की भी है अपनी कहानी
रात के अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

किसी ने खोया अपना बचपन
खोए कोई जवानी
कौन सुनेगा किसकी खोई
सबकी अपनी कहानी
कोई सब कुछ ले लेता है
कोई सब कुछ दे देता है
कोई भूले अपनी कहानी
और सुनाए किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से

हंसता देखो दिन में कोई
रैन भिगोए अखियां
सबके अपने बिछड़े साथी
सबकी अपनी सखियां
सबका अपना टूटा दिल है
सबकी अपनी मुश्किल
रस्ते में ही खोई
तुमने-हमने
अपनी मंजिल
हर चेहरे के अपने गम हैं
अपने-अपने किस्से
कौन लगाए किसका हिसाब
कितना गम है किसके हिस्से।

(.... ek bahut pahle likha geet)

बापू से संवाद -2

(गुजरात दंगों के बाद कुछ टूट गया था दिल में, जिसकी फांस शायद ही कभी निकल पाए, ये कविता है तो उसी परिप्रेक्ष्य में लेकिन बापू के जन्मदिन के साथ अयोध्या के अन्याय ने सारे जख़्म जैसे फ़िर से हरे कर दिये…… और इन सब के बीच आज की शान्ति…………)




बापू से संवाद -2


बापू
हमें फिर से बताओ
शान्ति क्या होती है?
वो जो दिखती है चेहरे पर
या वो
जो कत्ल के बाद
लाश पे रोती है

ये शान्ति है/
या बन्दरों के आखों की चमक
जिनके हाथों में सत्ता का अस्तूरा है
उन्हें नहीं सुनाई देतीं
कराहती आहें
;वो ‘बुरा नहीं सुनते’
पर ‘बुरा’ भी नहीं सुनतेद्ध
ये कैसी शान्ति
के सब शान्त
कातिल भी मकतूल भी
बुरा है
कत्ल करते देख लेना
विरोध का स्वर उससे भी बुरा
तो बापू!
हमें फिर से बताओ
शान्ति क्या होती है
वो जो दिखती है चेहरे पर
या वो जो हर उत्सव के बाद/
राजघाट धोती है

बापू!
शान्ति आज
खद्दर लपटे
रैम्प की कैट वाक पर है
और बाजार में हैं
दोनो के खरीदार
लहू की प्यास से तरबतर

घात लगाता शिकारी
शान्त था हमेंशा
पर मकतूल ने जब भी चाहा चीखना
तुम्हारी किताबें थमा दीं
बन्दरों ने
उनके थप्पड़ की छाप
दिखती है तुम्हारे चेहरे पर
और दहल गए हैं हम भी
इसलिए
बापू!
हमें फिर से बताओ
शान्ति क्या होती है
वो जो दिखती है चेहरे पर
या वो चुप
जो नया कत्ल बोती है।

बापू से संवाद -1



(गुजरात दंगों के बाद कुछ टूट गया था दिल में, जिसकी फांस शायद ही कभी निकल पाए, ये कविता है तो उसी परिप्रेक्ष्य में लेकिन बापू के जन्मदिन के साथ अयोध्या के अन्याय ने सारे जख़्म जैसे फ़िर से हरे कर दिये - पवन मेराज )

बापू से संवाद -1


बापू!
तुमने क्या सोचा था
तुम्हें हिंसा की सूली/
चढ़ाने के बाद
वो खूनी हाथ रूक जाएंगे!
क्या रक्त
बस इसलिए धो ड़ालता
बारूदी गन्ध!
के मृत्यु के अन्तिम/
क्षणों में भी
तुम्हारे मुख से निकला था
हे!राम!

बापू!
वो हाथ रूका नहीं
वो हाथ
आज संस्कृति के बीज बोता है
यूं तो बीज पहले के भी थे
जो पेड़ बने
पर आज जब लहलहाई है वो फसल
तो गायब है
राम के चेहरे से सारा विनय
खिच चुकी है प्रत्यन्चा
और सजा तीर
कौन दिशा में है
किसके लिए है
ये तो राम ही जाने
मैं तो जानता हूं बस इतना
किसी सीने में धंसी
तलवार पर थे
कुछ शब्द
पढ़ा तो कांप उठा दिल-
‘जय श्री राम’

बापू!
यह
‘हे राम’ से ‘श्री राम’ हो जाने की कथा है
या व्यथा है -
तुम्हारे बनबासी राम की
जो आदी हो चुके हैं
जंगलों के
तभी तो
राम भक्त हाथों ने
शहर में जंगल उगाए हैं
राम का घर बनाने को
बहुत से घर जलाए हैं।

जल सकते हैं
या जला सकते हैं
आग का काम है जलना
जलती रहेगी

आग निगल सकती है
हवेलियाँ
किन्तु नहीं पलती पत्थरों पर
आग पलने लायक
गेहूं कि बाल सा तपा
फूस सा नर्म दिल
सिर्फ हमारे पास है

जानता हूँ
ये सुलगता
ह्रदय को तपता
क्रोध से बड़ा कुछ है
किन्तु क्या होगा
कविता में गर ख़ोज भी लें
दिल में धधकती के लिए
आग से बड़ा कोई शब्द....
शब्द तो बाँझ है
अपने अर्थों के बिना
और आग के मायने हैं लज्ज़त
घर में चूल्हों तरह
आग के मायने हैं फ़ैल जाना
विचारों कि तरह
तिनका दर तिनका
और सबसे बढ़ कर
आग तो प्यार है मेरे दोस्त
जो तेरे सुलगते सीने को
मेरे सुलगते सीने से जोडती है
तो अपना सुलगता दिल लिए
खामोश क्यों बैठे हो
देख लो
बस तय करना है
जल सकते हैं
या जला सकते हैं
वर्ना आग का काम है जलना जलती रहेगी.

(कहते हैं 16 साल की उम्र में दिल..... खैर छोड़िये बिना किसी भूमिका के एक कविता आपके सामने पेश है ... ये कविता मैंने उसी 16 साल की उम्र में लिखी थी.)

प्रेमिका के नाम एक ख़त.....

दोस्त!
तुम पूछती हो न
मेरा दिल क्यों शाद नहीं है
उलझ के जिंदगी की रंगीनियों में मैं
क्योँ सुलझा नहीं लेता ग़मों की सारी गुत्थियाँ
देख के तुम सी हसीं
क्योँ उदास हो जाता हूँ
कहाँ खो जाता हूँ.

सोचता हूँ मैं
जब उम्र ने उसके चेहरे पर
अपना हिसाब नहीं लिखा होगा,
जब अनुभव सिलवटें नहीं बने होंगे
न सिलवटें चेहरा
तब उसकी जुल्फों का रंग रहा होगा गहरा
तब माँ भी खूबसूरत रही होगी
बिलकुल तुम सी
हँसती हुई
खिलखिलाती हुई.

यूँ तो माँ अब भी खूबसूरत है
बहुत कुछ भूल के
जब वो कुछ याद करती है
यादों की लहर
जब बहा ले जाती है माथे की शिकन
और हंस देती है हौले से जब कभी
तब माँ भी.....

दोस्त!
सब जानते हैं - पर मानते नहीं
उसकी हंसी को उम्र ने नहीं पिया
मै भी जानता हूँ
उसकी हंसी सुखा ले जाने वालों के नाम
पर बता नहीं सकता
जैसे गणित नहीं निकाल पता
सिलवटों में छिपे सवालों का हल
चार दीवारें + एक छत
=
जेलघर या घरमहल...

माँ को भी कहाँ था मालूम
जब संस्कारों की चौकी पर बैठ
देख कर अतीत का दर्पण
उसने लज्जा का श्रृंगार किया
हाय! नहीं था मालूम
उसने छोड़ दिया हक़ लड़ने का
बांध दी बेड़ियाँ अपनी ही दर्द की चीख़ पर
फिर संघर्ष बस इतना ही
एक अँधेरी गुफा से निकल
दूसरी अँधेरी गुफा में जाना
घुलते जाना - घुलते जाना
फिर क्या जेल - क्या घर
क्या परिवार - क्या चक्की
समाज कुछ और नहीं
बस तनी उंगलियाँ
जिनका काम ही है
वक्त -बेवक्त उठ जाना किसी भी तरफ

माँ को नहीं था मालूम
पर तुम समझ लेना मेरी दोस्त!
उम्र जिंदगी नहीं होती
न प्यार समझौता
इनके लिए लड़ती रहना मेरी दोस्त
इस पूरी दुनिया से
और दूसरे पाले में
मुझसे और खुद से भी.

कहावत और कथा

''तूफ़ान आया
झुक कर बची रह गई घास
और सारे तने पेड़
हो गए थे जमीदोज़''
यही कथा सुनी न जाने कितनी बार

बाप से तकरार करती मेरी आँखों को पढ़
माँ यूं सुनाती ये किस्सा
जैसे सुना रही हो अपना पूरा जीवन
जैसे थाम लेना चाहती हो वक्त
रोक देना चाहती हो
एक तूफ़ान।
उस आवाज के सन्नाटे में
अकेला सा हो जाता मै
सोचता
गर यही जीत है
तो हार किसे कहते हैं।

बाप, गुरुओं से होते हुए
अब हाकिमों से सुनता हूँ
यही कथा
जैसे हो मौसम विभाग की कोई चेतावनी
'' सब्ज मौसम बदल सकता है
आ सकता है कोई तूफ़ान कभी भी''
:
:
नहीं कोई तूफ़ान नहीं आया
हमने आने ही नहीं दिया
पर सन्नाटे में
अपना-अपना अकेलापन लिए
अपने- अपने से अजनबी
हम सभी
हमदर्द दोस्त
जिन्होंने संजो रखे हैं अब भी
न जाने किन किस्सों के जमीदोज़ पेड़
हो जाते हैं
कुछ और अकेले
जब छेड़ देता है कोई ये बदमजा किस्सा
'' छाया सिर्फ वही पेड़ देते हैं
जो तने रहते हैं ''

बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी !
(ज्ञात होगा कुशीनगर बुद्ध की निर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है। पिछडे़पन का दंश झेल रहे भारत के तमाम गावों की तरह ही यह स्थान भी अब विकास के कहर से रूबरू है....पर्यटन विकास के नाम पर यहां बुद्ध की 500 फिट उंची प्रतिमा बनाई जाएगी और इस परियोजना के प्रथम चरण में ही 7 गांव किसी ठोस योजना के अभाव में न जाने कहां को विस्थापित कर दिए जाएंगे। इस परियोजना का लगातार 6 साल से विरोध करते आ रहे किसानों की उन बौद्ध मठों ने भी नहीं सुनी जो शायद इसमें बैद्ध घर्म (मठ और मठाधींशों ) के विस्तार को तलाश रहे हैं। हालांकि यह कविता सिर्फ इसी बारे में नहीं, पर है उन्हीं संघर्षरत किसानों को समर्पित। -पवन मेराज )
(1)
यहां सोया है एक शख़्स
जो जाग गया था एक दिन/
दर्द की दस्तक से कुछ ऐसा धड़का दिल
छोड़ दिया राज-पाट लौट आया गांव
(हालांकि नहीं आती थी कोई भी सड़क
राजप्रासाद से गावांे की तरफ पर वह लौट आया...)
उसे तलाश थी दुख की
जीतना था उसे सबके लिए।
हमारे जेहन का
कुछ तो हिस्सा है उसका भी
और हैं अपने हिस्से के सवाल भी
उसके जेहन के लिए
छोड़ क्यूं आए थे/ राहुल को सोता ही?
यशोधरा को साथ क्यूं न लिया?
और कोई इच्छा ही न रहे
ये भी अजब दुर्निवार इच्छा है!
लाख अपना हो/ अक्स उसका
पर ये कहानी उसकी नहीं
ये कहानी है उस गांव की
जो अन्न बोता रहा ..... भूख फांकता रहा
कहानी है तमाम गावों की
जो सिद्धार्थ को तराश बुद्ध गढ़ते है।
खुद कुछ नहीं बनते ये गांव
नहीं जाती है कोई भी सड़क
गावांे से राजधानी की तरफ.....
पर वह लौट आया था यहां बेचैन!
अकेला! दुखांे के अन्त के लिए/
दुख तलाशने को अभिशप्त!
उसका धरम नहीं था इतिहास के ताड़पत्रों पर
‘दुख है .... तो कारण भी होगा’
तर्क की राह वो चला तो था कुछ दूर
पर उसने नहीं बनाई कोई भी सड़क
जो जाती हो गावों से राजधानी की तरफ
और
राजप्रासाद ने मुस्कुराकर छान लिया उसका धर्म
और एक तर्क गढ़ा
धर्म तर्कों से परे है।
ताड़पत्रों पर लिखे किस्सो ने/
उसे बना दिया ईश्वर
और गांव रह गया अकेला.....
ये गांव तब भी अकेले थे
जब तोड़े गए थे बामियान के तराशे पहाड़
और तब भी जब गढ़ा गया था इन्हें।
(2)
गांव रह गए तब और अकेले
जब बन रही थीं सड़कें
जुड़ रहे थे शहर....
कितने सिद्धार्थ सोते बच्चों को बिना प्यार किए
चले आए थे इधर बेचैन! अकेले!
दुखांे के अन्त के लिए/
दुख पाने को अभिशप्त!....
...गोड़वाऽ में जूता नईखेऽ
सरवा पे छतवाऽ हेऽऽ सजनी.....
पर बहुत व्यस्त होते हैं शहर
ये सिद्धार्थ को तराश बुद्ध नहीं गढ़ा करते
यहां हसरत भरी निगाह
चोरी की साजिश फुटपाथ पर बिछाया बोरा
और साम्राज्य के एक हिस्से पर कब्जा
अक्सर रख लिया जाता है/
सब कुछ एक ही खाने में।
पर दुत्कारते शहर को भी जरूरत थी
उसकी सो भगाया नहीं गया/
कभी पूरा का पूरा
हां रक्खा भी नहीं कभी अपने पास
दूर बजती थी एक धुन उदास
‘लागाऽ झुलनी का धक्का बलम कलकत्ताऽ .... पहुंच गइलें नाऽ’
इन्तज़ार सिर्फ एक ख़ला नहीं
झुलनी के लिए तन-चुल्हा और मन
हो गया धीरे-धीरे पहाड़
पर लौट कर नहीं आया उसका बुधिया
कभी पूरा का पूरा.....
सो नहीं दर्ज हुआ विस्थापन के बही ख़ातों में
कुछ भी ना मिला कोई हर्जाना
सियाही से आती रही
लहू की गन्ध पर ताड़पत्रों में
कहीं नहीं था उनका नाम
दर्ज है जिनका नाम
वो भी अब आने लगे हैं
गांव सदी का महान छाया-नायक कहता है-
‘किसान हूं मैं!’
और गांव हो जाता है कुछ और अकेला
सिंगूर, नन्दीग्राम खून के छींटे
हर तरफ ताड़पत्रों की प्यास बुझी नहीं अब तलक.....


(3)
अब आने वालों के पास है
सागर भर लेने की प्यास
और देने के लिए रिसती बूंद का स्वप्न
सदियों से ऐसी ही किसी बूंद को तरसता यह गांव
जहां सोया है एक शख़्स
जो जाग गया था एक दिन दर्द की दस्तक से
बह जाएगा इसका इतिहास भी.......
कौन सोचता है बुधिया और झुलनी
कहां होंगें तब जिनके लिए नहीं बचा
गांवों में भी कोई अकेला कोना
जगमगाते होटलों के बीच
तब खड़ा होगा एक राजप्रासाद,
राजप्रासद का स्वप्न/
देखने वालों के लिए और
हाय! चेहरे पर शान्त-स्निग्ध सी/
मुस्कुराहट लिए बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी।

(ये कोई आलेख नहीं, बात दरअसल यूं है कि ये बस गूगल पर छोटी सी बज़ थी "एक सवाल सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म का एक देवता बताईये जिसके हांथ में हथियार न हों?" यह बज़ कुछ लोगों को धर्म पर हमला लगी इसलिए बहस में तब्दील हो गई.. हालाँकि ऐसा नहीं है कि ये बहस हमेशा अपनी पटरी पर ही रही पर निश्चित रूप से है रोचक. और कुछ सवाल भी पैदा करती है. अब बज़ से हर कोई तो जुडा नहीं है इसलिए सोचा कि आप सभी लोगों को इससे परचित करवाया जाये.)

ashok paney ki buzz :एक सवाल - सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म का एक देवता बताईये जिसके हांथ में हथियार न हों?

दिवाकर मणि - जैन संप्रदाय इसका उदाहरण है17 Apr

अशोक कुमार पाण्डेय - जैन और बौद्ध संप्रदाय नहीं दो धर्म हैं जो वैदिक परंपराओं, जातिवाद, हिंसा और कर्मकाण्डों के विरोध में पैदा हुए थे…और बौद्धों के साथ जो सुलूक हुआ वह सब जानते हैं!17 Apr

दिवाकर मणि - जनाब, आपने एक सवाल का जवाब पूछा था और मैंने वही दिया है...अगर मेरा उत्तर गलत हो तो कहें.
आपकी नजर में संप्रदाय क्या है? और धर्म क्या है? जरा बताने का कष्ट करेंगे...(यदि जैन, बौद्ध इत्यादि संप्रदाय नहीं, धर्म हैं तो!!)17 Apr

दिवाकर मणि - आपने कहा- और बौद्धों के साथ जो सुलूक हुआ वह सब जानते हैं!
मुझे कुछ खास नहीं पता, कृपया इस संदर्भ में मेरा ज्ञानवर्धन करा सकें तो महती कृपा होगी (पूर्वाग्रह रहित होकर..)...17 Apr
दिवाकर मणि - मेरा मानना यह है कि अस्त्र-शस्त्र का विकास विनाश के लिए नहीं अपितु रक्षार्थ हुआ था.17 Apr

अशोक कुमार पाण्डेय - इतिहास का यह अध्याय इतना पुराना नहीं कि इसे किताबों में न ढूंढा जा सके। धर्म और संप्रदाय का फ़र्क बूझना भी इतना मुश्किल नहीं। जैन, बौद्ध, सिख इसलिये अलग धर्म हैं कि इनकी अपनी पूजा पद्धति, अपने आराध्य और अपना जीवन दर्शन है जो किसी और धर्म के अम्ब्रेला के रूप में नहीं स्वतंत्र है। जिन सवालों के बाद :-) लगाना पड़े वे अपना पूर्वाग्रह ख़ुद कहते हैं।

अस्त्र-शस्त्र का विकास रक्षार्थ भले हुआ था परंतु उनका उपयोग विनाश के लिये नहीं हुआ/हो रहा है क्या?17 Apr

Rajeev Nandan Dwivedi - @अशोक कुमार पाण्डेय : (सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म का एक देवता बताईये जिसके हांथ में हथियार न हों?
अस्त्र-शस्त्र का विकास रक्षार्थ भले हुआ था परंतु उनका उपयोग विनाश के लिये नहीं हुआ/हो रहा है क्या?)

यदि आज पकिस्तान भारत में घुसपैठ करे तो भगवान् श्री राम कैसे दोषी हुए जी!17 Apr

दिवाकर मणि - श्रीमा‌न्‌, धर्म और संप्रदाय का भेद बूझना इतना मुश्किल नहीं है तो फिर दोनों के बीच घालमेल की आवश्यकता क्यूं?
जैन अथवा बौद्ध को धर्म न कहकर संप्रदाय कहने का अनौचित्य दर्शाएं।
महोदय, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। कृषि का प्रारंभ मनुष्य की उदर-पूर्त्ति के लिए हुआ था, क्या उसी खेत में नशाकारक चीजें नहीं उगाई जा रहीं? औषधियों का उद्देश्य मनुष्य की जान बचाना है, क्या उनका नकारात्मक उपयोग नहीं हो रहा? कौन-सी ऐसी चीज है, जिसका कोई ना कोई नकारात्मक पहलू नहीं है? फिर, आपके द्वारा पूछे गए सवाल का तात्पर्य क्या है?
---------------
जब जवाब दिया तो आप मार्ग भटककर संप्रदाय और धर्म नामक शब्दों से खेलने लगे? विषयेतर होने से बौद्धिकता नहीं बढ़ जाती....17 Apr

अशोक कुमार पाण्डेय - ओह मानों यह धर्म और संप्रदाय के सवाल की आड़ ले आपने इस प्रश्न को भटकाया ही नहीं था कि सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म के किसी देवता का शस्त्रहीन चित्र है ही नहीं…हो सके तो भटकाने की जगह इसका जवाब दीजिये…गोल-गोल घूमना और घुमाने की कोशिश वाली बौद्धिकता पर मेरा विश्वास नहीं17 Apr

अशोक कुमार पाण्डेय - @ राजीव जी … घुसपैठ पाकिस्तान का विशेषाधिकार नहीं है…लगभग दुनिया के सभी सीमाओं पर ऐसे विवाद हैं और भारत सहित सब पर ऐसे आरोप हैं…ख़ैर इसका मेरे सवाल से कोई लेना-देना नहीं था…अगर उत्तर हो तो बतायें…वैसे प्रख्यात दलित चिंतक कांचा इलैया यह सवाल बहुत पहले पूछ चुके हैं उत्तर अब तक प्रतीक्षित है…17 AprD!w@K@R M@N!

दिवाकर मणि - अशोक जी, भटकाने का खेल आप ही खेल रहे हैं, मैंने अपनी प्रथम टिप्पणी में बता ही दिया था कि "जैन" संप्रदाय (जिसे आप धर्म कह रहे हैं, या चाहे तो पंथ भी कह लें..) के आराध्यों के हाथों में कोई शस्त्र नहीं है। क्या आप इस बात से असहमत हैं?
और हाँ, व्यक्ति कोई भी पूर्ण नहीं होता। सो "पूर्णावस्था को प्राप्त" वाली छवि से बाहर निकलें।
धर्म विषयक विचारों का कोई अंतिम परिभाषा नहीं है । "धार्यते इति धर्मः" अर्थात्‌ जो धारण किया जाए या धारण करने योग्य हो, वही धर्म है। आतंकवाद, धर्म के नाम हत्या इत्यादि (चाहे वो किसी भी मतानुयायी के द्वारा क्यों ना किया जा रहा हो) कृत्यों को हम धर्म के साथ नहीं जोड़ सकते। धर्म का अनुयायी होने के लिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख, इत्यादि किसी पंथ/संप्रदाय से जुड़ना या ना जुड़ना जरुरी नहीं, नास्तिकता भी उसका पैमाना नहीं। धर्म तो है- परोपकार, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह इत्यादि। सो इसे विवाद का विषय ना ही रखना श्रेयस्कर है। इस अर्थग्रहणानुसार हम समान ही है। मीमांसा दर्शन की यह उक्ति ध्यातव्य है- "यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेदि नेतरः" अर्थात्‌ जो तर्कों (कुतर्कों/वितंडावादों नहीं) से अनुसन्धित हो, उसे ही धर्म समझो। उसके अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है।19 Apr
दिवाकर मणि - और ये Religion के संदर्भ में "धर्म" का प्रयोग बिल्कुल ही अनुचित है। इसके लिए "संप्रदाय/पंथ" को अपनाना उचित होगा।19 Apr


pawan meraj - diwakar ji aapse asahmati ke liye mafi par jain, buddh or aise tamaam dharm apne utpatti se hi us sanatan gharm se alag hain (or adhikansh to uske virod me hi bane hain) jiki hindu dharm vale duhai dete hain. vaise savaal to ye bhi hai ki kya hindu vastav me koi dharm hai bhi ya nahi?Edit19 AprD!w@K@R M@N!

दिवाकर मणि - पवन जी, मैंने तो किसी भी पंथ की उत्पत्ति या अपने पूर्व के पंथ से अलगाव एवं उसके कारणों पर तो कोई बात कहीं ही नहीं है। आप पुनः मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ें। मैंने तो "धर्म" पद का Religion के संदर्भ में प्रयोग पर अपनी बात कहीं है। जहां तक एक का दूसरे से अलगाव की बात है, तो वह तो उसका वैशिष्ट्य होता है। और अलगाव होने से साम्यता बिल्कुल नहीं रहती, ये बात भी गलत है। उदाहरणार्थ- एक मनुष्य दूसरे से कई मायनों में अलग होता है, फिर भी एक दूसरे में "त्व" रूपी गुण की साम्यता तो होती ही है। वैसे ही जैन, बौद्ध भले ही अपनी उत्पत्ति से वैदिक (जिसे आप ब्राह्मण, सनातन या वर्तमान में प्रयुक्त हिन्दू) सिद्धान्तों/व्यवहारों से अलग हों, किन्तु उनमें भी कई समानताएं हैं।19 Apr
दिवाकर मणि - @ पवन जी, आपने कहा- jain, buddh or aise tamaam dharm apne utpatti se hi us sanatan gharm se alag hain (or adhikansh to uske virod me hi bane hain)
------------
तो इन तमामों का नाम बताएं। और यदि इन तमामों में आप खालसा (सिक्ख) संप्रदाय/पंथ को शामिल करते हैं, तो आपको अपना ज्ञानवर्धन करने की आवश्यकता है।19 Apr

pawan meraj - ye avashyakta shayad aap ko bhi pad sakti hai... balki hai01:27
pawan meraj - हिंदुत्व की दुहाई देने वाले सनातन धरम को अपना आधार बताते हैं.... सनातन धर्म को बताया जाता है कि वो वेदों पर आधारित है. महानुभाव जरा इतिहास का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे आरंभिक दौर में बौद्ध धरम को नास्तिक इसी वजह से कहा गया था क्योंकि उसने वेदों को कभी नहीं माना. जरा तार्किक हो कर सोचने की कोशिश करें और बताएं की क्यों इन सभी धर्मो को अलाग नियम और अलग किताबें लिखने की जरुरत पड़ी... इसी लिए क्यूंकि वो अलग थे. सिक्ख धरम को आप एक अलग धर्म ही नही मानते को ये भी बता दीजिये कि ये क्या है ..... ये बताइए कि क्योँ हिन्दुओं के साथ इनके वैवाहिक सम्बन्ध होना सामान्य बात नहीं है .... क्या सिक्ख कोई अलग जाती है .. यदि हाँ तो इसकी कौन सी जाती है ब्रह्मण chhtriya वैश्य या शूद्र.... क्योंकि वैदिक धर्म या आपका तथाकथित हिन्दू धर्म तो इसी पर टिका हुआ है.Edit01:53
pawan meraj - खालसा पंथ या आज के सिक्ख धर्म की हिन्दुओं से नजदीकी मात्र एक कारण है वो है मुस्लिमो से इसकी लड़ाई. इस लड़ाई का आधार कुछ दूसरे राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक कारण हैं.Edit02:01

आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति" - सारे धर्म दूसरे धर्मों की बुराई करने पर टिके हैं. हिन्दू धर्म कोई अपवाद नहीं है.09:28

दिवाकर मणि - @ मेराज जी, प्रगतिशील लिक्खाड़ों की तरह मैं "सबकुछ जाना-समझा हुआ" का तो दावा ही नहीं कर रहा। मैं तो ज्ञान रूपी सागर में अभी पहली ही डूबकी लगा रहा हूं लेकिन ऐसा लगता है कि आप लोगों ने पूरा का पूरा ज्ञान आत्मसात्‌ कर लिया है और अब दुनिया को उस ज्ञान को मनवाने पर तुले हैं। खैर, मैंने तो सिर्फ आपके उत्पत्ति विषयक घोषणा का जवाब दिया था कि सिक्ख संप्रदाय/पंथ का उद्भव किसी विरोध में नहीं हुआ था।
@ आराधना जी, किसी शोध/सिद्धान्त की स्थापना का अंतिम चरण होता है- निष्कर्ष। लेकिन हमलोग सबसे पहले उसे ही स्थापित कर देते हैं।11:03

अशोक कुमार पाण्डेय - दिवाकर जी, मैं इस बहस से बाहर इसीलिये गया था कि मुझे यह कहीं पहुंचती नहीं दिख रही। साफ़ है उस सवाल का ज़वाब आपके पास नहीं था। यह जो परोपकार वगैरह है अगर यही धर्म है तो किसको दिक्कत थी? भगत सिंह ने धर्म संबधी अपने आलेख में इस बात को बड़े अच्छे से रेखांकित किया है।

समस्या यह है कि सवाल जब झेले नहीं जाते हैं तो उन्हें ऐसे 'महान' सैद्धांतिक बकवादों से भटकाया जाता है। सीधी बात है कि जब हम हिन्दू धर्म की बात कर रहे हैं तो उस धर्म की बात कर रहे हैं जिसकी पूजा पद्धति और नियमावलियां वेद, पुराण, स्मृतियों और उपनिषद से हैं, जिसके आधुनिक स्वरूप को शंकराचार्य ने स्थापित किया था। इसी आधार पर जैन, बौद्ध और खालसा हिंदू धर्म के हिस्से नहीं अपितु स्वतंत्र धर्म है जिनकी नियामवलियां उक्त ग्रंथों से सम्चालित नहीं। धार्यति इति धर्मः का सवाल यहां नहीं है, यहां धर्म का मतलब उस पहचान से है जो प्रमाण पत्रों में दर्ज़ है, जिसकी सूचियां लेकर गुजरात में हत्यायें हुईं और जिसके आधार पर राजनैतिक दल अपने एज़ेण्डे संचालित करते हैं।हिन्दुत्व की वह परिभाषा जिसे सावरकर प्रतिपादित करते हैं और गोलवरकर विस्तारित्।

मनुस्मृति से एक श्लोकार्थ देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा


श्रुति का अर्थ है वेद और स्मृति का अर्थ है धर्मशाष्त्र। ये धर्म के प्रमुख अंग है। इन्हें हर प्रकार से प्रमाण मानना चाहिये। इसके बारे में कुतर्क नहीं करना चाहिये। ( दूसरा अध्याय श्लोक 10)

और इस दिखाई देने वाले धर्म के सभी देवी-देवता शस्त्र धारण करते हैं।

यहां मैने कोई पक्ष-विपक्ष भी नहीं चुना था। बस यह कहना चाहता था कि हिंसा किसी एक धर्म के खाते में ही नहीं है। अपने ऐतिहासिक-राजनैतिक कारणो से लगभग सभी धर्मों ने इसका सहारा न्यूनाधिक लिया ही है। ऐसे में किसी एक धर्म को लांक्षित करने की जगह धर्मों के राजनैतिक-सामाजिक संदर्भों का अध्ययन ज़्यादा बेहतर है। जहां तक मेरा मानना है तो मैं मानता हूं कि सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। इसी अर्थ में मैं ख़ुद को नास्तिक कहता हूं।

सिद्धांत स्तर पर धर्म की जो परिभाषा या विवेचना आपने बताई है वह व्यवहार में कहीं नहीं दिखती। अगर दिख रही होती तो फिर मेरे लिये यह सब लिखने की शायद ज़रूरत नहीं होती। हां मीमांसा के उदाहरण आपने दिये। लेकिन क्या वज़ह थी कि जब संविधान लागू हो रहा था तो ऐसी महान बातें करने की जगह संघ ने वर्ण व्यवस्था की वक़ालत करते हुए मनु स्मृति को संविधान की जगह लागू करने की बात की?

एक और मज़ेदार बात है कि जब हिन्दुत्व पर आक्रमण होता है तो व्यवहारिक बातों को तुच्छ बताते हुए पुराणों और मीमांसाओं से उदाहरण ढूंढे जाते हैं ( ठीक यही इस्लाम के समर्थक भी करते हैं) लेकिन जब हमला प्रगतिशीलता या वाम पर बोलते हैं तो सिवा व्यवहारिक उदाहरणों के मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन आदि के लेखन की कोई बात नहीं की जाती। यह तर्क पूरी आक्रामकता से ख़ारिज़ कर दिया जाता है कि इस सिद्धांत के मूल में वंचितों के उत्पीड़न की समाप्ति है। बस कुछ चलताऊ उदाहरणों से लिक्खाड़ जैसे सुवचनों द्वारा बात निपटा के 'निष्कर्ष' दे दिया जाता है। 'धर्म का नहीं कुछ व्यक्तियों का दोष' के तर्ज़ पर 'वाद का नहीं कुछ व्यक्तियों कादोष' वाली महान मुद्रा तब क्यूं नहीं अपनाई जाती? उस पर शोध की कोई शास्त्रीय आवश्यकता महसूस नहीं की जाती। यह दोहरापन क्यूं?

मेरा आपसे कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं। लेकिन बेहतर होता कि प्रगतिशीलता को गरियाने के साथ-साथ आप इसके बरक्स खड़ी विचारधारा के दुहरे मापदण्डों, मनुष्यताविरोधी चेहरे और साथ ही दंगाई मानसिकता के लोगों के साथ उनकी नाभिनालबद्धता की बात करते।11:21!

दिवाकर मणि - मान्यवर अशोक जी, आपके अनुसार सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता भी खो चुके हैं, और इसलिए आप नास्तिक हैं। आपकी नास्तिकता या मेरी आस्तिकता से जब तक किसी को हानि नहीं है, तब तक कोई परेशानी किसी को भी नहीं है, और ना ही होनी चाहिए।
एक बात बताएं, कि ये प्रगतिशील, बुद्धिजीवी महानुभाव या उनके संगठन केवल एकपक्षीय निन्दा/कार्रवाई में क्युं लगे रहते हैं। उन्हें हुसैन मियां के पक्ष में आवाज उठाना तो सही लगता है लेकिन तस्लीमा के समर्थन में आवाज दब सी क्युं जाती है? मुस्लिम-ईसाई के विरुद्ध अत्याचार तो दिखाई देता है, अपने ही देश में शरणार्थी हो चुके कश्मीरी पंडितों की आवाज सुनाई क्युं नहीं पड़ती? गुजरात पर तो दसेक सालों से हल्ला मचा रहे हैं, लेकिन जब गोधरा हुआ तो उन 58 परिवारों का आर्त्तनाद क्युं नहीं सुनाई पड़ा? कोलकाता के रिजवान का मामला तो उन्हे बहुत व्यथित करता है, किन्तु कश्मीर के रजनीश शर्मा की हत्या उन्हें क्युं नहीं चुभती? ऐसे बहुत से मामले हैं, जहां इनका एकपक्षीय व्यवहार बहुत कचोटता है। (यहां मैं किसी सिद्धान्त की बात नहीं करके व्यावहारिक मुद्दे उठा रहा हूं।)
जबतक प्रगतिशील जन अपनी दोहरी मानसिकता नहीं त्यक्त करते, तब तक उनकी बातें भी नक्कारखाने में तूती बन के रह जाएगी।
हिन्दूओं की उग्रता और कट्टरता को लेकर बहुत बातें हो रहीं हैं। लेकिन कभी ये तथाकथित प्रबुद्धजन यह जानने की कोशिश किए कि ऐसा क्यूंकर हो रहा है? और जिसे आप दंगाई मानसिकता कह रहे हैं ना वो इन्ही प्रबुद्ध जनों की देन है। समभाव को स्थापित करने हेतु औरंगजेब जैसे क्रूर शासक का नया इतिहास लिखकर एक सौम्य चेहरा रख दिया। आवश्यकता है इन प्रगतिशील लोगों को अपनी कथनी और करनी बदलने की।12:18

आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति" - अशोक जी ने तार्किक ढंग से बात कही है. बात यही है कि प्रत्येक धर्म के ठेकेदारों ने समय-समय पर हिंसा का सहारा लेकर अपने स्वार्थ साधे हैं. कोई भी धर्म इससे अछूता नहीं है. चाहे वह सिखों के खालिस्तान की माँग लेकर आतंकवाद की बात हो, चाहे उनके खिलाफ़ चौरासी के दंगे हों, चाहे हिन्दुओं द्वारा गुजरात संहार हो या बौद्ध धर्म प्रधान श्रीलंका का आतंकवाद हो, मुसलमानों का आतंकवाद हो या इस्राइली यहूदियों का...नेता बहकाते हैं...आम मुद्दों से ध्यान हटाने के लिये, आम आदमी बहक जाता है इसी आस्था के नाम पर...
बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों के विरुद्ध जनमानस के आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया था, पर कालान्तर में वो भी उन्हीं कर्मकाण्डी विसंगतियों का शिकार हो गया...फिर भी अन्य धर्मों से कम हिंसक हैं बौद्ध...म्यांमार में बौद्ध भिक्षुओं का शान्तपूर्ण मार्च बहुत दिन पहले की घटना नहीं है...फिर भी एक धर्म के रूप में मैं उसकी भी पक्षधर नहीं हूँ, क्योंकि उसका साथ देने का मतलब अन्य धर्म नाम की संस्था को मानना है...इन सब से हट्कर आम आदमी की समस्याओं पर ध्यान दिये जाने की ज़रूरत है. धर्म बेहद व्यक्तिगत मामला है...मानना हो तो मानो पर दूसरों पर मत थोपो और दूसरों से श्रेष्ठ खुद को मत घोषित करो
किसी ज़माने में हिन्दू भी सहिष्णु हुआ करते थे...आम आदमी वैसे भी सहिष्णु होता ही है...पर बाबरी विध्वंस और गुजरात संहार के बाद मुझे खुद को हिन्दू कहने पर शर्म आने लगी है...मैं खुद को गैरधार्मिक कहा जाना ज्यादा पसन्द करूँगी.12:25

अशोक कुमार पाण्डेय - आप किनकी बात कर रहे हैं पता नहीं मेरा दृष्टिकोण तस्लीमा और हुसैन पर स्पष्ट है। चाहें तो जनपक्ष पर मेरा लेख 'हुसैन का समर्थन तस्लीमा का विरोध कैसे हो गया' http://jantakapaksh.blogspot.com/2010/03/blog-post_967.html पढ़ लें।

वैसे क्या आप उन लेखों से सहमत हैं जो तस्लीमा ने हिंदू कट्टरपंथ पर लिखे हैं? या उस प्रस्थापना से कि हर धर्म औरत का दुश्मन है…जिसमें उन्होंने वेदों, स्मृतियों आदि से भी क़ुरान तथा बाइबिल की तरह ही स्त्री विरोधी उद्धरण क़ोट किये हैं? बस प्रसंगवश कि बाबा साहब ने भी अपने लेख 'स्त्री और प्रतिक्रांति' में लगभग वही उदाहरण दिये हैं।

और यही उम्मीद कथनी और करनी के संबद्ध में दूसरे पक्ष से क्यूं न की जाय? क्यूं उनका हुसैन पर चीखना और तस्लीमा पर हुंकारना जस्टीफ़ाई किया जा रहा है? या कि उनसे किसी सम्यक व्यवहार की उम्मीद ही नहीं बची है तो उनकी तरफ़ यह सवाल आप उठाते ही नहीं? अगर आप हमेशा एक तरफ़ की बात करेंगे तो दूसरी तरफ़ की बात कोई तो करेगा? अगर आप ख़ुद गुजरात पर ख़ामोश रहेंगे तो दूसरे से गोधरा पर बोलने की उम्मीद क्यूं? हर ज़िम्मेदारी प्रगतिशीलता के कंधे पर ही क्यूं?

और जैसा मैने लिखा था प्रगतिशीलता की आलोचना के लिये आप व्यवहारिकता के मैदान में आ ही गये जबकि धर्म रक्षा के लिये आप सिद्धांत के नभ में विचरण कर रहे थे। व्यवहारिकता की यही खुरदरी ज़मीन उनके लिये क्यूं नहीं? क्या यह दोहरी मानसिकता नहीं? या बस पर उपदेश कुशल बहुतेरे?

और इस क्यूंकर से मेरी सहमति नहीं है। यह एक दुष्प्रचार है। जब यहां हिंदू महासभा बनी या सावरकर ने हिंदुत्व लिखकर नस्लीय भेद की शुरुआत की तो यह परिदृश्य तो नहीं था। जब गोलवलकर 'वी' लिख रहेथे तब तो प्रलेस जैसा कोई संगठन था भी नहीं। जब देश में भाजपा की सरकार थी तब यह हिंदू उग्रवाद क्यूं फैला अपनी ही सरकार द्वारा संरक्षित होने के बावज़ूद?

सच यह है कि जैसे माओवादियों का एज़ेण्डा सिर्फ़ दंतेवाडा तक महदूद नहीं संघ का भी बस गुजरात तक नहीं। असल लक्ष्य देश की सत्ता पर कब्ज़ा कर इसे एक हिन्दू थियोक्रेटिक राज्य में बदलना है। यह समझने के लिये गोलवलकर की किताब और संघ का तमाम लिट्रेचर पढ़ा जा सकता है। आप चाहें तो मैं कोट दे सकता हूं। वह इस देश के संवैधानिक लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट करना चाहता है।12:30

दिवाकर मणि - अरे भाई साहब, सभी तो अपनी-अपनी ही बातों को कहेंगे ना! और जब आपने प्रगतिशीलता और धर्मनिरपेक्षता का झंडा हाथ में थाम रखा है, तो आपकी जिम्मेदारी अपने पक्ष को रखना है कि नहीं?
आप कह रहे हैं- हर ज़िम्मेदारी प्रगतिशीलता के कंधे पर ही क्यूं? तो ये लेबल अपने ऊपर चस्पां ही मत कीजिए।
और भी कि अगर आप हमेशा एक तरफ़ की बात करेंगे तो दूसरी तरफ़ की बात कोई तो करेगा? तो महोदय काहे का प्रगतिशीलता और धर्मनिरपेक्षता का झूठा ताना-बाना ओढ़ कर बैठे हैं। उतार फेंकिए, और खुलेआम शामिल हो जाइए उस जमात में।
जितना तस्लीमा को मैंने पढ़ा है, उतना उनसे सहमत हूं। और मान्यवर, मैंने कब कहा कि हिन्दु धर्म पूरी तरह सही है, या कि उसमें कुरीतियां नहीं हैं? लेकिन क्या आपको यह ज्ञात नहीं कि इसमें संशोधन-सुधार के लिए काफी बड़ी जगह भी जो अन्यों में कम ही पाई जाती है।12:57

pawan meraj - मेरे लिए ये बहस बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए मै इसे एक छोटे से सवाल से आगे बढ़ता हूँ .. नए धर्म की उत्पत्ति ही क्यों होती है... क्या इसीलिए नहीं कि समय के बदलाव के साथ-साथ पुराने धर्म के नियम और संस्कार समाज की गतिशीलता को बाधित करने लगते हैं. लेकिन उससे पहले ये भी कहना चाहूँगा कि हर धर्म ने समाज को कभी न कभी गति दी होती है. पर इसके साथ एक समस्या भी होती है. धर्म जड़ होते हैं और समाज गतिशील. और इसी रूप में कालांतर के बाद नए धर्म कि आवश्यकता पड़ती है. नए की इसलिए क्यूंकि पुराना काम नहीं आ पा रहा और धर्म की इसलिए क्यूंकि ये आस्तित्व के पहचान का भी मसला है.....ईश्वर की किसी भी रूप में इबादत धर्मो का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है परन्तु एक मात्र वही धर्म नहीं. यही कारण है कि ईश्वर एक है इसमें किसी धर्म को कोई एतराज नहीं होता परन्तु फिर भी धर्म अलग अलग और एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं. गौर से सोचें और ये बताएं कि आखिर क्या कारण है कि जब सब धर्मो में बहुत सी बातें एक सी हैं. (ख़ास तौर पर संसार की उतात्ति को लेकर) तो क्योँ नए की जरुरत पड़ती है? ... अब जिसकी उत्पत्ति ही पुराने से विरोध से हुई हो उसे पुराने का विरोधी ही कहा जायेगा. और हर नए धर्म को पुराने के अत्याचार झेलने पड़े हैं. हाँ खूंरेजी कितनी हुई यह हमेशा इस बात पर निर्भर रहा कि नए धर्म के राजसत्ता के साथ समीकरण कैसे बैठते हैं. भूलिए मत गुरु नानक को क्या क्या झेलना पड़ा था जब वे अपने नियमो का प्रचार करने निकले.... येशु को सूली पर चढ़ना पड़ा. इतिहास खंगालिए बौद्धों को क्या क्या नहीं झेलना पड़ा. मुहम्मद साहब ने क्या क्या क्या नहीं झेला. हालाकि उस वक्त तक उनमे से कोई भी अलग धर्म भी नहीं घोषित हुआ था. उस समय इन लोगों को राजसत्ता ने कुछ अलग और प्रायः बागी मानते हुए सजा भी दी. परन्तु जब भी नए का गठजोड़ राज्साता के साथ हो गया या इसने हासिल कर ली तो भाई बन गया एक नया मजहब. यह भी जोड़ देना मै जरूरी समझता हूँ कि हर नया धर्म अपने उत्पत्ति के समय पुराने से आगे होता है पर अपनी जड़ता की वजह से जल्द ही अपनी उर्जा खो बैठता है और अब जब कुछ नया आता है तो यह भी उनके साथ वही सुलूक करता है जो कभी उसके साथ हुआ था. धर्म सिर्फ इबादत का तरीका ही नहीं होता लोगों के लिए उनके अस्तिव की पहचान का भी मसला होता है इसलिए इससे उनका अलगाव आसान नहीं. (शायद ग़लत वक्त पर कह रहा हूँ पर सच है इसी रूप में कुछ लोगों के लिए मार्क्सवाद भी धर्म हो जाता है और वो उसे भी तार्किक ढंग से नहीं देखते) .... खैर जहां तक आज के समय का सवाल है मेरे जैसे व्यक्तियों के लिए मान्य धर्म कौन सा होगा तो जवाब है .....विज्ञान और सिर्फ विज्ञान. पर पुराने लोग अपने घिस चुके मजहबों के साथ टिके रहना चाहते हैं तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है ... मगर उफ़! पुराने जानते हैं की ये उनसे असहमति का नतीजा है इसलिए वो मुझे अपना विरोधी ही मानेंगे प्रताड़ित करने का प्रयास करने की कोशिश करेंगे (करते ही हैं कभी परिवार वालों के रूप में कभी तथाकथित स्वघोषित समाज के रूप में) उन्होंने को मेरे जैसो के लिए गाली भी गढ़ रक्खी है.... प्रगतिशील लिक्खड कहीं का. (यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई किसी पर चिल्लाये "कमीने समजदार कहीं के) . शायद मुझसे ही भूल हो जाती है कि कभी कभी मै प्रगति को गाली मानने वालों को जड़ कह उठता हूँ.
खैर मुझ जैसे लोग जो विज्ञान को अपनी पहचान मानने कि कोशिश करते हैं आज के समय ' भटके हुए बागी टाइप के लोग समझे जाते हैं.' शायद एक दिन राज सत्ता ऐसे ही लोगों के हाथ होगी तब.... :-)

@ दिवाकर भाई मेरा नाम पवन मेराज है न कि सिर्फ मेराज. आप जब तक इस बात को नहीं समझेंगे तब तक बहुत सी दूसरी बातिन को नहीं समझ पाएंगे :-)13:02

दिवाकर मणि - मेराज जी, अभी मेरी आँखे ईश्वर की कृपा से अच्छी है, और सबकुछ स्पष्ट देख-पढ़ लेता हूं। आपका पूरा नाम आपकी हर टिप्पणी के साथ आता है। आपको दूसरे की नीयत देखने से पहले अपना छिद्रान्वेषी चश्मा उतारने की आवश्यकता है। यही तो बात जुदां करती है आपलोगों को, दूसरे के बारे में स्वयं से ही धारणा बना लेते हैं।
आप महानुभावों से कुछ कहने-सुनना व्यर्थ ही है, जिसे दूसरों को वैसा ही देखना है, जैसा वो चाहता है। लगे रहिए.......13:43

अशोक कुमार पाण्डेय - बिल्कुल ठीक दिवाकर जी…श्राप देकर भाग जाना विद्वानों की पुरानी आदत है! शायद आपको ग़लतफ़हमी थी की आप उपदेश देंगे और सब हां गुरुजी कहकर स्वीकार कर लेंगे। पर हमे सत्य के पक्ष में लड़ना सिखाया गया है।

देख तो आप रहे हैं सभी को अपनी तंग नज़र से और जवाब देने की जगह लेबल चस्पा किये जा रहे हैं। ख़ुद पर कोई आक्षेप लेने को तैयार नहीं। जब सुविधा हो मंत्र सुनाकर आसमानी तर्क और जब सुविधा हो व्यवहारिक उदाहरण देकर आक्षेप। यह कौन सी तर्क पद्धति है?

पूंछ से संबोधित करना नज़र की दुरुस्ती नहीं तंगनज़री दिखाता है कि आप किस पहचान को महत्व देते हैं…पवन को या कि मेराज को! फिर भी लगे रहिये…13:50D!w@K@R M@N!

दिवाकर मणि - देखिए अशोक जी, आप खामख्वाह आरोप लगा रहे हैं। मेराज या पवन नाम के आधार पर मैंने कोई टिप्पणी नहीं की, और ना ही मेराज नाम से संबोधित करने के पीछे मेरा कोई अन्यार्थ उद्देश्य था, लेकिन पवन मेराज जी ने इस संबोधन को भी जब "अपनी हांकने के लिए" आधार बना लिया तो वो मुझे नागवार गुजरा। और इसी आधार मैंने इससे पूर्व की अपनी टिप्पणी लिखी। आप भी अपने को उसी दिशा में ले रहे हैं।
एक बात और जान लें, इस आभासी दुनिया में मैं कोई उपदेश देने नहीं आया हूं। हां, आप जरूर एक नए तंत्र की पुरोहिती थामे लग रहे हैं।14:13

अशोक कुमार पाण्डेय - कौन क्या लग रहा है…पाठक तय कर लें…पुरोहिती सवालों से भागकर अपनी न सुने जाने की खीझ में झलकती है…जवाब देने के लिये सुविधा से सवाल चयनित करने में भी

सवाल मेराज तक सीमित नहीं हैं…ख़ैर14:16D!
दिवाकर मणि - अगर पूर्व से ध्यान दें तो पवन मेराज को संबोधित टिप्पणी में प्रथम "पवन जी" के प्रति ही है। वो तो दिखाई नहीं दिया महोदय!!14:33

pawan meraj - दिवाकर जी चलिए आहात न हों मै पवन मेराज वाली बात को वापिस ले लेता हूँ मूल बात ये है ही नहीं ... पर ये भी आपको मानना पड़ेगा कि बहुत से लोगों को इससे बहुत फर्क पड़ जाता है.(मुझे ख़ुशी है आप उनमे शामिल नहीं हैं,) .... यकीन जानिए इस नाम के बाद ही मुझे इस बात का एहसास हुआ कि शांत रहने vale लोगन कि निगाहें भी किस तरह प्रताड़ित कर सकती हैं ... khoon hamesha khanjar se hi nahi kiya jataEdit14:48

अशोक कुमार पाण्डेय - हां मैने उस टीप को देखा…आप सही हैं बन्धु
पर ज्ञानवर्धन वाली पुरोहिती बात भी उसीमें है15:05

pawan meraj - अब बहस को फिर पटरी पर लाया जाये ....:-)
यह सवाल अपनी जगह वैसे ही अनुत्तरित है
१. सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म का एक देवता बताईये जिसके हांथ में हथियार न हों?
बिना किसी पूर्वाग्रह और बिना किसी निष्कर्ष के मै इसमें एक सवाल और जोड़ दे रहा हूँ
२. हिन्दू वास्तव में कोई धर्म है क्या ? गर है तो पूरे भारत में कौन-कौन हिन्दू है और क्योँ.15:40
pawan meraj - bahas me baki sabhi logon ka bhi swagat hai ... shirkat karenEdit15:45

Rajeev Nandan Dwivedi - बिल्कुल ठीक पाण्डेय जी…अनर्गल प्रलाप करना आप की पुरानी आदत है !
शायद आपको ग़लतफ़हमी थी की आप उपदेश देंगे और सब हां गुरुजी कहकर स्वीकार कर लेंगे, पर हमे संघ की शाखाओं में सत्य के पक्ष में लड़ना सिखाया गया है.
मैं आपकी तरह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, पर कुछ तथ्य रखना चाहूंगा, न कि आपकी तरह फालतू की बातें और घटिया अर्थहीन अप्रमाणिक सिद्धांत !
१. जहां तक मेरा ज्ञान है जैन, बौद्ध और सिख धर्म हिन्दू धर्म के अंतर्गत ही आते हैं, अन्यथा वे अल्पसंख्यक होते और आरक्षण के लिए मार-काट मचा रहे होते.
हिन्दू कोड (बिल) अधिनियम उन पर भी लागू होता है, संविधान भी थोडा सा पढ़ लें.
मुस्लमान शरीयत के लिए और इसाई अपने क़ानून के लिए लड़ते रहते हैं. पर ये कभी भी अपनी ही जड़ों यानी कि हिन्दू धर्म के विरूद्ध नहीं बोलते.
मान्यताएं तो अपना जगह हैं.
मान्यताओं का क्या है, वह तो हर व्यक्ति तक कि मान्यताएं समय-समय पर बदल जाती हैं. कोई कभी धार्मिक हो जाता है, कभी नास्तिक.
कोई किसी साल होली खेलने निकला कभी घर में ही बैठा रहा.17:12

pawan meraj - पहली बात तो यह कि धर्म कभी भी संविधान से नहीं तय होता..... और संघियों को इतनी ही चिंता है संविधान कि तो वो क्यों मुसलमानों को चैन से नहीं जीने देते ... गुजरात , अयोध्या और दूसरी जगहों पर ऐसी कोशिशे करने वाले किस सत्य कि बात कर रहे हैं ..... खून से रंगे हैं हाथ आपके आप लोगों के मुह से धरम शब्द का उच्चारण भी उसे अधार्मिक बना देता है.....यह संघियों कि आदत रही है कि वे वक्त पड़ने पर अपनी सुविधानुसार कोई भी मान्यता अपना लेते हैं इसे थाली का बैगन होना कहते हैं .... कोई सिद्धांत नहीं .Edit17:34

pawan meraj - वैसे इस बात का तो सुकून मिला ही कि कम से कम आप इतना तो मानते हैं कि आप को ज्ञान नहीं है .... पर फिर भी आप बाज नहीं आयेंगे :-)Edit17:37

अशोक कुमार पाण्डेय - राजीव जी…कितना और कबसे जानते हैं आप मुझे?

और जहां तक आपका शिशु मन्दिरीय 'ज्ञान' है उसके भरोसे आप बस ऐसी मूर्खतापूर्ण बाते ही कर सकते हैं। आपका जवाब देना भी मुझे समय की बर्बादी लग रहा है।

आपकी जड़ शिशु मन्दिर में है इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया के हर धर्म की जड़ वहीं है जहां तक आप देख पा रहे हैं। संविधान में इन धर्मों को अल्पसंख्यक का दर्ज़ा प्राप्त है जिसके बारे में आपकी शाखा में बताया नहीं गया।

इसे समझने के लिये थोड़ा नहीं पूरा पढ़ना होता है। शाखा में विधर्मी से धोखे और छल से लड़ना सिखाया जाता है और मुझे उसका ख़ूब अनुभव है…पढ़ना और तर्क करना उनके पाठ्यक्रम से बाहर की चीज़ है।

जिनकी मान्यतायें डंडे के डर या फिर नोटों के लालच में रोज़ बदल जाती है उन्हे गंभीर बहसों में नहीं उतरना चाहिये न सिद्धांतों का ढोल पीटना चाहिये।17:43

pawan meraj - सवाल अपनी जगह वैसे ही अनुत्तरित है
१. सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म का एक देवता बताईये जिसके हांथ में हथियार न हों?
२. हिन्दू वास्तव में कोई धर्म है क्या ? गर है तो पूरे भारत में कौन-कौन हिन्दू है और क्योँ.Edit17:55


अशोक कुमार पाण्डेय - दूसरा सवाल पवन का है।
वैसे जैन समुदाय के बारे में बता दूं कि सुप्रीम कोर्ट ने इनके प्रतिनिधियों द्वारा किये गये केस के बाद इन्हें अलग धार्मिक समुदाय के रूप में मान्यता देने का केन्द्र सरकार को निर्देश दिया है। उनके प्रतिनिधि इसके पक्ष में जो अभियान चला रहे हैं उसमें सारी डिटेल्स हैं इसे यहां देखा जा सकता है http://www.petitiononline.com/jm7i2004/petition.html

Also the Government of India Resolution No.F.8-9/93-SC/St dated 28-7-95 of the Ministry of Human Resources Development, in its Memorandum of Minorities Education Cl.3.1.3 mentions that “according to 1981 census the religious minorities constitute about 17.4% of the population of which Muslims are 11.4%, Christians 2.4%, Sikhs 2%, Buddhists ).7% and Jains ).5%. It means that per 10,000 persons in India 8,264 are Hindus, 1,135 are Muslims, 243 are Christians, 195 Sikhs, 71 Buddhists and 48 are Jains.”18:0243 previous comments from D!w@K@R M@N! दिवाकर मणि, अशोक कुमार पाण्डेय, Rajeev Nandan Dwivedi and 2 others
अशोक कुमार पाण्डेय - कौन-कौन माइनारिटी में शामिल है यह जानने के लिये भारत के अल्पसंख्यक आयोग की वेबसाईट पर जनसंख्या के आंकड़े भी देख लीजिये

http://ncm.nic.in/minority_population.pdf

और पर्सनल ला मुद्दे को समझने के लिये यह आलेख http://www.mainstreamweekly.net/article98.html

वैसे आप तो क्या ख़ाक पढ़ेंगे…यह जो पढ़ना चाहते हैं बस उनके लिये…18:04

pawan meraj - अरे अशोक भाई बस करिए नहीं तो राजीव जी अभी शाप दे डालेंगे :-) या ये भी कह सकते हैं ये सब पकिस्तान की चाल है....नहीं तो कुतर्की , सही तथ्यों को ग़लत वक्त पर रखने वाला 'प्रगतिशील कहीं का' कहने लगेंगे..... भाई ये नहीं समझ आता प्रगतिशील होना in लोगों के लिए गाली क्यों है, क्या वाकई प्रगति से इतना चिढ़ते हैं yeEdit18:12

और तबसे बज़ पर कोई जवाब नहीं आया वैसे सवाल अब भी अनुत्तरित है
सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्म का एक देवता बताईये जिसके हांथ में हथियार न हों?

एक सैनिक की मौत

(दांतेवाडा की घटना के बाद तो जैसे होड़ सी मच गई है घटना की निंदा ... स्पष्ट कर दूँ मुझे भी कोई प्रसन्नता नहीं है इस पर, पर यह भी स्पष्ट है कि मै असली कसूरवार किसी और को मानता हूँ. इस घटना के बाद मेरे पास बहुत से मेल आये. इनमे से अधिकांश वो लोग है जिन्होंने कभी 'दरअसल यूं' पर मेरा लेख ' बुलेट बैरक और भारत पढ़ा था. देशभक्ति के जज़्बे और गुस्से से भरे ये लोग जानना चाहते हैं कि अब इस घटना पर मै क्या कहूँगा .... कुछ भी कहने से पहले मुझे अशोक पाण्डेय की कविता 'एक सैनिक की मौत' याद आ रही है. मुझे लगता है इस कविता के बाद कम से कम सैनिकों की देशभक्ति वाली व्यथा के बारे में कुछ और कहने के लिए कम ही बचेगा....पेश है अशोक पाण्डेय की कविता एक सैनिक की मौत
- पवन मेराज )


एक सैनिक की मौत
-अशोक पाण्डेय

तीन रंगो के
लगभग सम्मानित से कपड़े में लिपटा
लौट आया है मेरा दोस्त

अख़बारों के पन्नों
और दूरदर्शन के रूपहले पर्दों पर
भरपूर गौरवान्वित होने के बाद
उदास बैठै हैं पिता
थककर स्वरहीन हो गया है मां का रूदन
सूनी मांग और बच्चों की निरीह भूख के बीच
बार-बार फूट पड़ती है पत्नी

कभी-कभी
एक किस्से का अंत
कितनी अंतहीन कहानियों का आरंभ होता है

और किस्सा भी क्या?
किसी बेनाम से शहर में बेरौनक सा बचपन
फिर सपनीली उम्र आते-आते
सिमट जाना सारे सपनो का
इर्द गिर्द एक अदद नौकरी के

अब इसे संयाग कहिये या दुर्योग
या फिर केवल योग
कि देशभक्ति नौकरी की मजबूरी थी
और नौकरी ज़िंदगी कि
इसीलिये
भरती की भगदड़ में दब जाना
महज हादसा है
और फंस जाना बारूदी सुरंगो में
शहादत !

बचपन में कुत्तों के डर से
रास्ते बदल देने वाला मेरा दोस्त
आठ को मार कर मरा था

बारह दुश्मनों के बीच फंसे आदमी के पास
बहादुरी के अलावा और चारा भी क्या है?



वैसे कोई युद्ध नहीं था वहाँ
जहाँ शहीद हुआ था मेरा दोस्त
दरअसल उस दिन
अख़बारों के पहले पन्ने पर
दोनो राष्ट्राध्यक्षों का आलिंगनबद्ध चित्र था
और उसी दिन ठीक उसी वक्त
देश के सबसे तेज़ चैनल पर
चल रही थी
क्रिकेट के दोस्ताना संघर्षों पर चर्चा

एक दूसरे चैनल पर
दोनों देशों के मशहूर शायर
एक सी भाषा में कह रहे थे
लगभग एक सी ग़ज़लें

तीसरे पर छूट रहे थे
हंसी के बेतहाशा फव्वारे
सीमाओं को तोड़कर

और तीनों पर अनवरत प्रवाहित
सैकड़ों नियमित ख़बरों की भीड़ मे
दबी थीं
अलग-अलग वर्दियों में
एक ही कंपनी की गोलियों से बिंधी
नौ बेनाम लाशें
.
.
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अजीब खेल है
कि वज़ीरों की दोस्ती
प्यादों की लाशों पर पनपती है
और
जंग तो जंग
शांति भी लहू पीती है!

जिंदगी खूबसूरत ......

(बहुत से लोगों ने कहा की बहुत दिन हुए कुछ लिखा ही नहीं .... माफ़ी चाहता हूँ आप लोगों से, पर इत्मिनान रखिये लिखने के लिए ही आज कल जिंदगी को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ )
फिर भी दोस्तों के इसरार पर .....


ज़िन्दगी एक ख़ूबसूरत क़िताब है
इसे हड़बड़ी में न पढ़ें .....
कभी एक पन्ना मोड़ कर
पिछले सारे किस्से से कर लें बात
क्या पता
कहीं कोई एहसास छूट गया हो
अनदेखा।
अनचीन्हा /
कोई सपना
टूट गया हो
और पता भी न चला हो
ऐसा कोई सपना था भी कभी ।

जनाब !
यूँ कब तक बस जिल्द संवारते रहेंगे
जरा ध्यान तो दें
कभी
लिखे पर भी

वाह !
सारी दुनिया से छुपा कर
बड़ा महफूज रखा है आपने इसे

कभी किसी को तो पढ़ने दें !

हाँ जनाब !
जानता हूँ किताबों के साथ
होते हैं खतरे बड़े
पर सबसे बड़ा ख़तरा तो यही है
के इसे कोई न पढ़े

इसी लिए तो कहता हूँ
जिन्दगी एक
खूबसूरत क़िताब है
इसे हड़बड़ी में न पढ़ें ......
- पवन मेराज

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